ज़िन्दगी के packets के size मैं बदलाव

20 12 2011

सोचो ज़रा
के बचपन में और आज में
हम में और समाज में
अंतर क्या है?

सोचो ज़रा
पहले बेपरवाह कहलाते थे
अब लापरवाह कहलाते हैं
ये जंतर क्या है?

भाई मैं तोह बदला नहीं.

अब भी:
पढ़ाई का डर,
चीज़ें खोना,
देर से उठना,
ना ही उठना,
सब बाकायदा बरकरार हैं

फिर भी पहले हम नादाँ थे,
अब हम गवार हैं!

मैंने खूब सोचा सर खरोचा लोगों से पूछा,
और आप को जानकार ख़ुशी होगी,
के उत्तर प्राप्त हो चुका!
ये गुत्था अब खुल चुका.

दरअसल,
आप से बिन कहे, बिन पूछे,
ज़िन्दगी अब बड़े packets  में आने लगी है.
और इस वजह से अब और
तेज़ी से जाने लगी है.

स्कूल ख़त्म होने तक तो
प्रति वर्ष
दुनिया पूरा चक्कर लेकर
फिर घूमने को तैयार हो जाती थी
अर्थात
इम्तिहान की घडी आती थी,
खूब खौफ लाती थी,
पर पेपर ख़त्म हुए नहीं के ज़िन्दगी
फिर शुरू हो जाती थी.

अब एक साल तो हज़म हो जाता है.
पर एक बार में भला कोई इंसान,
पूरा डब्बा लड्डू खाता है क्या?

अरे भाई राशन हर महीने लाते हो -
या फिर ज़िन्दगी भर का राशन
किसी गोदाम मैं भरे जाते हो?

थोड़ी subtle बात है
और वैसे भी देर रात है,
तो चलो, बिना मिसाल ही कह देता हूँ.

जिस दिन से college में कदम रखा
ज़िन्दगी के चार साल जैसे कमर से जुड़ गए,
और देखते ही देखते, ना जाने कहाँ उड़ गए.

एक साल का छोटा packet ही सही था
कम से कम हर वक्त कमबख्त
सर दर्द तो नहीं था!

निचोड़ सारी बात का बस इतना है मेरे दोस्त
अब
ज़रा सोचने का वक्त
आ चुका.

क्योंकि college  के बाद का packet
Packet  नहीं एक बहुत बड़ा,
भारी
डब्बा है.
जिसपे बड़े-बड़े लाल अक्षरों में
“Career ” छपा है.

और इसी अकेले डब्बे में
तुम्हारी ज़िन्दगी के अगले चालीस साल हैं.
तब तक घसीटते रहोगे
जब तक सर पे बाल हैं.

तो या तो इस चालीस साल के डब्बे को
ढोने के लिए  तैयार हो जाओ,

या रुको,
ज़रा सोचो,
डब्बे से एक दो साल के छोटे-छोटे packet चुराओ
किसी की न सुनो,
और -

फ़रार हो जाओ.








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