आबशार-ए-आरज़ू

– दुआ है इस बार तू इस कदर मिले
यगाना मुक़द्दर मिले, सुहाना हमसफ़र मिले…
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– कई बहते हैं दिल से आबशार-ए-आरज़ू
किस मैं डूब जाऊं के सागर मिले?
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– मंजिल के लिए कोसों चला लीजिये,
पुराना कोई मुसाफिर वहाँ गर मिले!
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– मुट्ठी-भर ख़्वाबों के बीज लिए चला हूँ,
डर है के सर-ज़मीन न बंजर मिले…
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-सबको गले से लगाता चल ओ राही
जाने किस शक्ल में हमसफ़र मिले?
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-लेते उनसे हम हर ज़ुल्म का हिसाब
हमारे दर्द से मगर वो बेखबर मिले!
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One thought on “आबशार-ए-आरज़ू

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