बढ़िया ही हूँ

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कुछ महीनों पहले  मैं  वहां  पहुँच  गयी
जहां  शायद  नहीं  जाना  चाहिए  था
उस  जगह  की  रूह  ने  मुझे  वो  दिया,
जो  शायद  नहीं  पाना  चाहिए  था .
आज़ादी . बचपना . एक  नजरिया  मिला .
अब  कई  सालों  बाद , दिमाग -शिमाग  के  मुह  पे  tape लगा  के
डूब  जाने  के  लिए  एक  दरिया  मिला.
और  मैं  डूब  गयी .
उन  चंद  महीनों  के  लिए ,
सांस  लेना  भूल  गयी .
मैं  डूब  गयी .
सड़कों  पे  भीड़  में  खो  गयी ,
जहां  सर  रखने  को  मिला  वहीं  सो  गयी .
छोटी  छोटी बातों  पे  रो  गयी ,
और  हंसी ! हंसी  का  तो पूछिए  न ,
मुस्कुराना  तो  इतना  आम   हो  गया  था  क्या  कहूं!
जैसे  ज़िन्दगी  की  गर्दन  पे  छूरी  रख  के  कोई  बोल  रहा  हो :
चल  भाई , हंस  दे . मुस्कुरा . खुश  हो  जा . फ़टाफ़ट .
उठो  तोह  खुश .
सोने  जाओ  तोह  खुश .
नहाते  हुए  खुश .
खाते  हुए  खुश .
ना  खाते  हुए  खुश .
सारा  समय  मन  का  meter पूरा  दायें – हरी  वाली  side पे .
और  फिर  मैं  घूमने  लगी ,
जगह  जगह   भटकने  लगी .
मन  में  ऐसे  गुबार  उठे,
मन का  मीटर  इतना  हिलने  लगा
बात  बात  पे  ऐसा  फड़कने  लगा
के  मीटर  बेचारा  overload होके
सड़  गया .
इतनी  चाहतें , इतनी  आहटें , इतने  अपार  दुःख!
इतने  सारे  जज़्बात  मुमकिन  हैं , किसे  पता  था  भाई?
हज़ारों  बार  मैं  अन्दर  से  जल  उठी,
हज़ारों  बार  मैं  गुस्से  से  उबल  उठी,
मोहब्बत  थी , नफरतें  थी !
निराशा थी , हसरतें  थी !

हाँ  तो  में  कह  रही  थी , के , मतलब ,
मज़ा  आया . नहीं  मतलब ,
अच्छा था , ठीक  था , बढ़िया  ही  था .
आजकल  इस  से  ज्यादा  लोगों  को  हज़म  नहीं  होता .

घूमने  गयी . क्यों ?
अच्छा  नहीं  गयी. क्यों?
खुश थी. क्यों?
अच्छा  नहीं  थी .   क्यों ?
बेकार  था . क्यों ?
अच्छा  कमाल  था . क्यों ?
अच्छा  भैया , माफ़  करो , मतलब ,
अच्छा  था , ठीक  था , बढ़िया  ही  था .  हाँ  अब  ठीक  है.

दरअसल  वापस  आने  पे  मैं  तो वैसी  ही  थी ,
पर  बाकी  दुनिया  कहीं  और  ही  जा  पहुंची  थी.
जहां  मेरा  जहां  आसमानों  के  पार  था ,
ये  दुनिया  अपने  पंख  सी  चुकी  थी .
तोह  हार  के , धीरे-धीरे ,
दिन-ब-दिन , बात-दर-बात,
अपने  दिमाग  के  मुह  से  tape उतारके ,
दिल  के  मुह  पे  लगाने  लगी .
“नौकरी  ढून्ढ . उड़  नहीं .
सोच , समझ , उड़  नहीं !
टिक  के  बैठ , उड़  नहीं !
थोडा  कम  हँस . उड़  नहीं !”
मैं  तो  बस  बैठी  थी .
बीच  में , चुप -चाप .
और  चारों  तरफ  यही  parade
चिल्लाते  लोग , पद -चाप .
एक  दिन  मैंने  हाथ  खड़े  किये .
सारे  जज़्बात  समेटे , सपने  संभाले, उम्मीदें  बांधी,
और  बहुत  प्यार  से , ध्यान  से ,
एक-एक  डिब्बे  मैं  बंद  करके ,
डिब्बे कोठरी मैं  फ़ेंक  दिए .
कोठरी  को  ताला  लगाया ,
चाभी  को  चबा  खाया .
आखिर  में  मन  का  मीटर  जो  था ,
उसे  दोनों  हाथों  से ,
बहुत  प्यार  से , ध्यान  से ,
ज़मीन  पे  रखा
जूते  पहने ,
और  उनकी  नोकीली  एडियों  को
मीटर  के  पार  कर  दिया .
मन  ही  पे  वार  कर  दिया .
अगले  दिन  कमरे  से  निकली  तो  मैं ,
मतलब  अच्छी  थी , ठीक  थी , बढ़िया  ही थी .
अगले  कुछ  हफ़्तों  मैं  मैंने बहुत  सोचा .
टिक  के  बैठी . सर  खरोचा .
काम . नौकरी .
औरों  की  ख़ुशी .

कभी  कभी  अन्दर  से  एक  छोटी  सी  आवाज़  बोलती ज़रूर थी,
सुनते  ही  मैं  अपना  purse  खोलती  थी ,
और  उस  आवाज़  के  मुह  पे  tape  लगा  देती  थी .
और  कुछ   हो  न  हो  मेरे  purse  में ,
Tape  ज़रूर  रहती  थी.

बात  ये  है के  इंसान  कुछ   इस  तरह  बना  है  के  अगर
ये  दिल  धड़कना  छोड़  दे ,
कुछ  दिन  धडकनें  तोड़  दे ,
तो मतलब , पक्का  नहीं  पता , पर  सुना  तो  यही  है , के
जीना ज़रा मुश्किल हो  जाता  है .

और  यही  हुआ , जनाब . यही  हुआ .

दिल  धीरे-धीरे  धड़कना  भूल  गया .
और  दिमाग  से  खून  सूख  गया .

एक  दिन  मैं  कमरे  मैं  आई ,
बिस्तर  पर  बैठी .
जूते  उतारे .
आईने  मैं  देखा .
बाल  ठीक  किये .
फिर  से  बाल  ठीक  किये .
बैठते  क्यों  नहीं ?
सर  पे  पानी  डाला ,
कंघी  से , थोडा  ज़्यादा  ज़ोर  लगा  के ,
फिर  से  ठीक  किये .
बैठते  क्यों  नहीं ?
बैठते  क्यों  नहीं ?
और  बालों  से  लड़ते-लड़ते,
न  जाने   कब , न  जाने  कैसे ,
बाँध  टूट  गया .
ताले  खुल  गए , वोह  डिब्बे  फूट  गए , tape  पिघल  के  मोम  हो  गयी ,
मैं  दुनिया  की  सिखाई  हर  बात  का  विलोम  हो  गयी .
वो  सारे   कैद  अरमान ,
वोह  सारे  दबे  जज़्बात
कीड़े  बनके  मेरे  बदन  पे  रेंगने  लगे .
जगह  जगह  काटने  लगे .
देखते  ही  देखते,
मेरे  आस  पास  बैठ  गए ,
और  अपने  सुच -दुःख  मुझसे  बांटने  लगे .
मैंने  उनसे  माफ़ी  मांगी ,
Tape  purse से  निकाल  के  दीवार  पे  तंगी ,
और   कसम खायी  के  अब  और  नहीं .
बहुत  हुआ . अब  और  नहीं .

तो  ज़माने , सुन ,
तू  अपना  काम  कर .
अब  रहने  दे  मुझे.
तू  आराम  कर .

मेरा  ख़याल  करने  के  लिए  शुक्रिया ,
पर  अब  मेरे  लिए  तुमने  काफी  कर  लिया .
मेरी  ज़िन्दगी  है . संभाल   लूंगी .
जैसी  भी  होगी , गुज़ार  लूंगी .

बहुत , बहुत  शुक्रिया .
बस , अब  बहुत  हुआ.

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