ख्व़ाब

ऊंचा इक पहाड़

खाई गहरी
तेज़ हवाएं
जलते ख़्वाबों की बू
दूर एक ढलते सूरज से
आँखों में धुआं
नज़रें मदहोश
कंप-कंपाते घुटने
पसीने की अकेली टपकती बूँद
बिजली सी
छाती पर रेंगती
दिल छोटा । मुरमुरा ।
मुंह खुला पर
आवाज़ नहीं ।
जुबां पर कुच्छ मचलते अलफ़ाज़ पर
आवाज़ नहीं ।
वोह खाई गूँज उठती मगर
आवाज़ नहीं ।
तो बहरहाल
कूदने की बजाये
आँखों से कुच्छ बूँदें अदा हुईं
घुटने ढय गए ।
रेत और पत्थरों के बीच
थोड़ी जगह बनाकर
वहीं, स्थिर रह गए ।
मुंह अब भी खुला – बहुत प्यास।
कितनी आशाएँ ।
मेरे गाल से एक नमकीन बूँद
जब तक सिमटकर
रेत तक पहुँचती
सामने आकाश बुझ गया
सूरज डूब गया।
मैं कूदा नहीं ।
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