मुज्ज़फर्नगर के दंगे

टीवी पर न्यूज़ देखी तो दंग रह गये। 
दरअसल जिन से हम मुहब्बत करते हैं
उनका मुज़फ्फरनगर से तालुक़ है,
तो ज़ाहिर है कि सबसे पेहले
उन्ही को फ़ोन किया।

“आपकी नानी ठीक हैं?”
लाइन की दूसरी ओर,
वो गुर्रा उठीं,
कहने लगी के दंगा हुआ है,
मलेरिया नहीं,
जो मेरी नानी का हाल पूछ रहे हो।
मैंने कहा – क्या मतलब?
वो बोली के दंगा तो पूरे शहर में हुआ है,
लोग सड़कों पे काटे जा रहे हैं
और आप देहलीज़ के इस तरफ का हाल मांग रहे हैं?
फ़र्ज़ करो मैं कहूं के
नानी सलामत हैं, ठीक हैं
तो आप तो तसल्ली कर लोगे?
क्योंकि दरवाज़े के बाहर
कौन किसका क़त्ल-ए -आम कर जाए
हमारी सेहत पे क्या असर पड़ता है?
हमें तो बस अपनी परवाह है।
मैं । मेरा परिवार। मेरी जायदात।
मेरे छोटे, कड़वे उसूल।
मैं और मेरी 4 by 4 गज़ की दुनिया
जिसमे मेरे अलावा किसी और के लिए
जगह थोड़ी तंग है ।
और दंगे का जो लाल रंग है
वो तोह पूरे शहर पे छा चुका ।

फिर मेरे कुछ कहने से पहले ही
वो बोली – तुम छोड़ो ।
और ये कहकर फ़ोन काट दिया ।

बात समझो तो ठीक ही थी ।

किसी हम से बड़े दिलवाले ने जब दुनिया बनायी थी
तब उसने तो रिश्तेदारियों का नहीं सोचा ।
इंसानियत की तीन मूल धाराएं –
माँ , मलेरिया और मौत –
हम खुद नहीं चुन सकते हैं ।
क्योंकि जन्म, बीमारी, और दुश्मन की गोली,
ये पूछ के नहीं आते
के आप पंडित हो या क़ुरेशी ।
तो जब ज़िन्दगी इतनी विशाल है,
पक्षपात नहीं जानती,
जब हमारे सारे अनुभव,
हमारा वजूद,
ये सब बस सृष्टि का एक अजब खेल है,
जिसके नियम हमें किसी ने नहीं बताये –
तो
मुज्ज़फर्नगर में हमारा कोई हो ना हो,
जिसका rape हुआ वो हमारी बहन हो न हो,
जो डेंगू से मरा वो हमारा बेटा हो ना हो,
ये फिर भी हमारे ही साथ हो रहा है।
क्योंकि मैं तो बस एक पर्दा है
जिसके पीछे हम
सृष्टि का एक अविभाज्य अंश
छुपा के बैठे रहते हैं।
जैसे यहाँ मैं हूँ ,
और यहाँ मैं ख़त्म ।

दरवाज़े खिड़कियाँ बंद करके
हम जब तक यही सोचते रहेंगे
के हम महफूज़ हैं
ये अनहोनियाँ हम होने देते रहेंगे ।
ये अपराध हम खुद पे करते रहेंगे ।

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